आप की किस्मत सिर्फ और सिर्फ आपके अपने हाथ में है, और किसी के हाथ में नही. ये बात जानते सभी हैं पर मानता कोई नही. एक कहानी सुनाता हूँ आपको. एक बिलियनेयर का बच्चा है और एक मिडिल क्लास फैमिली का. आप कहेंगे कि अमीर घर के बच्चे की किस्मत अच्छी है और मिडिल क्लास वाले की बुरी है. पर ऐसा नही है. बच्चों के लिए सबसे प्रिय होता है खेल. मिडिल क्लास वाला बच्चा रोज 2-3 घंटे खेलता है बाहर जाकर दोस्तों के साथ पर अमीर घर का बच्चा नही खेल पाता वो बालकनी से खड़े होकर और बच्चों को खेलता हुआ देखता है. उसे allow नही है अपने से लो स्टैण्डर्ड वालों के साथ उठने बैठने की. वो रोज आँखों में आंसू लिए बस देखता रहता है. उसके पास हजारो खिलौने है पर उन खिलौनों का क्रेज नही है उसमे जबकि मिडिल क्लास वाले बच्चे के पास चार खिलौने हैं पर क्रेज है. अब बताओ किसकी किस्मत अच्छी हुई? मिडिल क्लास वाले की न. अब यहाँ टर्निंग पॉइंट आता है. मिडिल क्लास वाला बच्चा खेलते खेलते थक जाता है और उस अमीर घराने के लड़के को बालकनी में खड़ा देखता है और सोचता है कि उसकी किस्मत कितनी अच्छी है उसके पास बड़ा सा घर है. ढेर सारे toys हैं. कार है. मेरे पापा के पास तो बस स्कूटर है. अब किसकी किस्मत अच्छी हुई? यहाँ दोनों की किस्मत अच्छी है और खराब है. पल पल में किस्मत बदलती है. इसकी जड़ है हमारी अपनी डिजायर्स. अगर हम डिजायर्स को बदलते हैं तो हमारी किस्मत बदल जाती है.
हर सिचुएशन की पॉजिटिव साइड भी होती है और नेगेटिव भी. हमे दोनों देखना है पर चूज पॉजिटिव करना है.मान लीजिये एक चिड़िया है वो ख़ुशी से उड़े जा रही है तभी उसने पानी में तैरती मछली को देखा. अब अगर उसका मन करने लगे कि मै भी मछली जैसे होती तो तैर पाती यहाँ उसकी किस्मत बुरी हो गयी. यही मछली के साथ है वो चिड़िया को देख के ये सोचे कि मै क्यों नही उड़ पाती तो यहाँ मछली की किस्मत बुरी हो गयी.अंत में इतना ही कहना चाहूँगा वेदों में बहुत पहले ही लिखा गया था "यथा दृष्टि तथा सृष्टि" जैसी नजर वैसा संसार. किसी शायर ने भी ख़ूब कहा था- "शौक-ए-दीदार है अगर तो नज़र पैदा कर"
हमे अच्छा देखना,अच्छा सुनना है फिर अच्छा बोलना है अच्छा करना है.
हर सिचुएशन की पॉजिटिव साइड भी होती है और नेगेटिव भी. हमे दोनों देखना है पर चूज पॉजिटिव करना है.मान लीजिये एक चिड़िया है वो ख़ुशी से उड़े जा रही है तभी उसने पानी में तैरती मछली को देखा. अब अगर उसका मन करने लगे कि मै भी मछली जैसे होती तो तैर पाती यहाँ उसकी किस्मत बुरी हो गयी. यही मछली के साथ है वो चिड़िया को देख के ये सोचे कि मै क्यों नही उड़ पाती तो यहाँ मछली की किस्मत बुरी हो गयी.अंत में इतना ही कहना चाहूँगा वेदों में बहुत पहले ही लिखा गया था "यथा दृष्टि तथा सृष्टि" जैसी नजर वैसा संसार. किसी शायर ने भी ख़ूब कहा था- "शौक-ए-दीदार है अगर तो नज़र पैदा कर"
हमे अच्छा देखना,अच्छा सुनना है फिर अच्छा बोलना है अच्छा करना है.
नोट- ये आर्टिकल संदीप महेश्वरी की एक स्पीच से लिया गया है।

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